मंगला
रामप्रसाद और रुक्मणी के एक ही बेटी मंगला। हरिपुरा गाँब मे रहती है। पिताजी गांब की प्राथमिक विद्यालय मे अध्यापक। महीने मे तनखा मेहज दस हजार। चलने मे कोई कठिनाई नहीं। मंगला अब गांब की ही उच्च विद्यालय मे दसई क्लास मे पढ़ती है। गांब की सारे लोग मास्टरजी को मानते हैं। खूब सम्मान करते हैं। कभी भी कोईभी कसी की कुछ बुझने सूझने मे कोई दिक्कत आता तो मास्टजी के पास आजाते। मास्टरजी भी बहत सरल और परोपकारी स्वभाव के थे। सभी को अपना सामर्थ्य के अनुसार सहयोग करते थे। लोगों के बुरा वक्त में भी कायिक,बाचीक और आर्थिक साहाज सहानुभूति प्रदान करते थे। ये सारे गुण हेतु गाँब के लोग अपनेलिए मास्टरजी को भगबान का अबतार ऐसा मानते थे। हर काम मे सलाह लेते थे और हर उत्सब मे बुलाते थे। गांब की हर दुख सुख मे मास्टरजी को शामिल करते थे। मंगला भी पापा के साथ हमेसा हर जगह उपस्तिथ रहता तो व भी गांब की हर ब्यक्ति और हर परिस्थिति को भली भांति जानती थी।
मंगला एक सरल,सुशील,बुद्धिमता सम्परना लड़की। हमेसा कुछ नया करके दिखाने का शौक रखती थी। हरपल कार्य चंचल,चुलबुली सी स्वभाव। किसी को खुश देख ने के लिए व कुछ भी करने को जुटजाती थी। किसी की दुःख को अपना ही दुःख जैसा मानती थी। हमेसा अपना सामर्थ्य के अनुसार किसी भी प्रकार का सहायता प्रदान करने के लिये निकल आती थी। उसकी वेसा एक छबि थी की जो भी देखे कुछ आनंद का अनुभूति करता था। असहाय और दुःखियों के लिए तो व आसा की किरण ही थी।
इसी साल व दसई परीक्षा मे प्रथम श्रेणी मे उत्तीर्ण हो चुकी है। पिताजी चाहते हैं कि मंगला की उच्च शिक्षया बगल का सेहर अर्जुनपुर मे स्थित रामनारायण कालेज मे हो,लेकिन माँ रुकमणी एक राक्षयनसील महिला होने के नाते हमेसा माना करते थे। फिर भी सहमति बनी और मंगला को वहां दाखिल कियागया। मंगला पढ़ने लगी। सेहर जा के देखा की वहां ढेर सारे लोग शिक्षित है। हर कोई पढ़ाई लिखाई मे माहिर हैं तो वे हर क्षेत्र मे आगे हैं। उनके जीबन सैली भी ज्यादा उत्कृष्ट है। हर कोई कुछ न कुछ करते हैं। जब व ये जाना की उसकी सहपाठी ललिता का माँ दो गाय पाल के महिने मे पांच हजार रुपैया कमाते हैं, आस्चर्य चकित होगी।
फिर मंगला मन ही मन सोचने लगी की क्यों न व अपनी गाँब का महिलाओं को संगठित करके कुछ ऐसा करें की वे लोग भी कुछ कमाने के लिए सक्ष्यम बनें ताकि महिलाओं के सामाजिक स्थिति सृदृढ़ होने के साथ साथ घरेलू हिंसा भी नाहो। हर क्ष्येत्र मे गांब की प्रगति हो।
मन हे तो मौका जरूर आता है। पढ़ाई के साथ साथ जब भी कभी कोई समय मिलता हे तो व गांब की महिलाओं के साथ मिलती थी और सरकार की मिशन सक्ति की बारे मे बातचित करती थी। पहले महिलाओं मे उतना उत्साह नहीं था लेकिन मंगला की बात पर दम था। जैसे भी हो पहले कुछ महिलाएं आगे आये और एक समूह बनाए। मंगला उनके लिए हर कागजात का जिम्मा ली। महिलाओं ने एक संगोश्ठी बनाए और उसका नाम मंगला संगोश्ठी रखली। मंगला महिलाओं के लिए संगोश्ठी का सरकारी नियमानुसार पंजीकरण कराया। ग्रामीण बैंक से भी संगोश्ठी के लिए ऋण मुहब्जा कराया। संगोश्ठी की हर महिला पच्चीस हजार प्रति जन हिसाब से ऋण लेके दो दो गाय पालने लगे। हर महीना पांच हजार से जैदा कमाने लगे। परिबार को आर्थिक सहायता करने के साथ साथ बैंक को ऋण भी भूकदान करने लगे। ये सारे बात जाननेके बाद गांब की बाकी महिलाओं ने भी आगे आए और संगोश्ठी बनाके अपना आर्थिक और सामाजिक स्थिति बढ़ाने लगे। घरेलू हिंसा दिनवा दिन घटने लगा और देखते ही देखते गांब की उन्नति चरम सीमा पे पहंच गई। सरकार की मिशन सक्ति का लक्ष्य भी सफल हुई। इसी काम मे अपना योगदान के लिये मंगला को सरकार की ऒर से इनाम मिला।गांब की हर लोग उसे प्रसंसा करने लगे और मंगला को गांब की बेटी बोल के संबोधित करने लगे।
इसी कहानी से ये सिख मिलती है की दृढ़ इच्छासक्ति कोई भी क्ष्येत्र मे किसी को भी सफलता दिला सकता है।
धनन्यबाद.....

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