गूंगी जमाना
अभिराम ग्यारह बर्ष का एक छोटासा बालक। पाहाडी इलाका बालिपाटना बस्ती मे रहता है। गांव की अधिकांश लोग दरिद्रता का सीमा रेखा की अंदर रहते हैं। व खुद भी एक दरिद्र परिबार का बारिस है। निरक्षयोरों की संख्या भी कुछ कम नेहीं। एक या दो को छोड़ के बाकी सारेलोग अनपढ़ और गबार। किसीने कभी स्कूल की दरवाजे पर भी नहीं गये है। अभिराम का परिबार भी उन मे से एक है। उस का एक बहत बड़ा परिबार दादा-दादी,नाना-नानी,मां-पापा आदि के साथ साथ वे लोग चार भाई बहन एक ही परिबार मे रहते।अभिराम को सभीने अभी बोलके पुकारते हैं। उसका स्वभाव थोड़ीसी नटखट वाला जरूर था मगर साधु और सत्यबादी। झूटी बात बोलनेतक उस को नहीं आता। पढ़ाई मे भी हमेसा तत्पर रहता। खेल-कूद,नाच-गाना, किसी को कोई सहायता करना उसका चरित्र का एक बिसेसता है। जो कुछ जब भी करता दिल से और मन लगा के करता तो उसका हर एक काम सच्चा और अच्छा ही होता। कुल मिला के कहाजाए तो चरित्र और स्वभाव की दृष्टि कोन से व लाखों मे से एक ऐसा ही अच्छा लड़का है।
पिता-माता,गुरुजनों के प्रति प्रगाढ़ भक्ति और सम्मान देने का बात तो कोई उन से सीखे। ठीक हे कुछ दुस्ट प्रबृत्तियाँ जरूर है। ये कोई आचमीत होने का बात नहीं होता। छोटी सी उम्र मे ये होता ही है। उम्र और परिबेस का असर तो रहेगा ही। इसके लाबा संग गुण का असर अबश्य रहेगा ही। अभिराम केबल नहीं इसी उम्र मे हर कोई बच्चा दुष्ट प्रबृत्तियों के लपेट मे आहि जाते हैं।
लेकिन उसका हर काम मे आगे जाने का बिजिगिसा अनेक बार उसके ऊपर प्रतिकूल असर भी डालता। उसका यही एक ही लौता बुरा आदत जो दूसरों को उनको दुष्ट कहने को मौका देता। हमेसा और एक बात अक्सर देखने को मिलता की उनमे इतना सारे अच्छा स्वभाव रहता कि हर कोई उसको टेढ़ी नजर मे देखते थे। ये एक जाहिर सी बात हे की जब भी कोई किसी की समकक्ष्य होने मे असमर्थ महसूस करे तो इर्षा अपनी आप आएगा ही। अभी की क्षेत्र मे भी ठीक वैसा ही है। सहपाठी,दोस्त लोग,उसका बुराई ढूंढते ही रहते है। कोई भी बात पे बाकी सारे एक हो के अभी को गलत करार देने मे जुटजाते।
ये कोई सिर्फ एक या दो दिन की बात नहीं है। हर वक्त, हर जगह यही एक सिलसिला चलता ही रहता,लेकिन अभी अपनी स्वभाव के साथ सच्चाई और ईमानदारी के साथ हर कार्य करते गया। जब उम्र बढ़ने लगा व आदत भी बढ़ने लगा। अपनी को और अच्छा साबित करने को उनमे उत्सुकता तथा तत्परता बढ़ता गेया। साथ ही साथ उसकी अंदर एक उज्वल और बलिस्ट ब्यक्तित्व निखारने लगा।
पहले व नासमझ था। आखिर कियूं हमेसा उस की खिलाफ ही नाइंसाफी हो रही है। सारे अच्छा और सच्चा कार्य की बाबजुत भी कियूं उसको ही बुरा साबित किया जाता है। सोचते सोचते समझ मे आया कि उसका एक ही कारण ये ही हे कि व हे लोगों का डर। अपनी को दूसरों की आगे गिरिहुयी कैसे भी कोई देख सकता भला। अपना गलती को छुपाने के लिए वे लोग प्रयास कररहे थे,बल की उसको बुरा साबित करना उसके उद्देश्य ही नहीं था। अपनी आपको अच्छा साबित करना सबसे अच्छा बात हे। लेकिन अपनी को अछि साबित करने के लिये किसी और को गलत करार देना भी सबसे बुरा बात होता हे जो वे जानते हुए भी करते हैं। हा...हा.... संसार की नियम तो नियति से बना है। कोई चीज ज्यादा दिनतक छिपाया नहीं जासक्ता। सच एक न एक दिन रंग जरूर लाता ही रहता है। कियूं की सत्य ही भगबान होता है। एक के बात एक ,लोगों के हर गलत बात को जानते हुए व अपनी आप को और बलिस्ट ब्यक्तित्व की ओर बढ़ाते गेया। परिसेस मे ऐसा एक समय आया कि हर कोई बस उसको देखते ही रहगये तब और किसी के पास उसके खिलाफ कहने को कुछ नहीं रहा। जमाना उसकी आगे गूंगी बनगेई।
हमे इसी से यही सिख मिलती हे की अच्छा बनने का इच्छा किसी को भी अच्छा बनासक्ता है। दूसरा बात ये की अच्छा गुण कभी भी किसी की कुछ कहने पर गलत बनता नहीं बरंग और निखरता। तिसिरा ये हे की अपनी गलतियों को छिपाने के लिए दूसरों को गलत करार देना गलत और आत्म हानि
ही होता।
धनन्यबाद.....



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