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परोपकार

परोपकार


  थोडीसी पुरानी जमाना की बात।तब लोग अब जैसे नहीं थे। कई प्रकार से भिन्न थे।रेहेन सहन,आचार ब्यबहार,रुचि
काम-काज हरचीज मे अलग थे। इसका बहत बड़ा ऐक कारण ये था की उसवकत लोग ज्यादा तोर पर निरक्षयर थे। अशिक्षित थे।पढ़ाई लिखाई करने का उतना ज्यादा अबसर भी कहाँ था। स्कूल कालेज ना के बराबर था। शिक्षया का अभाव हेतु लोगों के मस्तिष्क उतना बिकसित नहीं हुआ था। कुल मिलाकर कहाजाए तो मनुष्य प्रकृति की अनुसार जीबन बिताता था।प्रकृति ओर मनुष्य मे एक मधुर संपर्क था। युग बदला तो रुचि ओर आबस्यकता बदली मनुष्य दिनवा दिन स्वार्थी बनते गेया। फिर अब व प्रकृति की प्रधान सत्रु बनने लगा।

  मनुष्य ओर प्रकृति की मित्रता आज भी बिलुप्त नहीं हुआ है। इसीका एक ज्वलंत उदाहरन फिर भी जीवित है।। अब भी धरती की बहत सारी अंचल मे अनगिनत लोग बंशगत रूप मे घन घोर बन मे बसबास करते आरहे हैं। उनके लिये बनभूमि ही संसार हैं। उन्हीं लोगों को हम बनबासी या आदिबासी बोलके जानते हैं। मिट्टी ओर लकड़ी से बनाया हुआ झुपुड़ी मे रहना,कन्द मूल,फल ओर शिकार करना उनके दैनंदिन जीबन की जीविका हैं। जंगल मे मंगल है,वे खुद उसका जिबन्त उपलक्ष्य होते हैं।


  उसदिन शिकार खेलना एक जीविका था। कुछ लोग खाने के लिये तो कोई बेचने के लिये नियमित शिकार करते थे।शिकार से उनके रोजी रोटी चलता था।उसे लोग ब्याध बोलते थे।

  ऐसा एक ब्याध था। एकदिन ओ शिकार करने के लिये अपना धनुष-बाण निकाल कर सीकार पर निकला। कुछीदुर जंगल की अंदर घुसने के बाद देखा ,एक कपोत निम की पेड़ पे बैठा रहा है। उसको शिकार करने के लिए अपना धनुष बाण निकाला ओर लक्ष्य बनाने लगा। ठीक ऐसा एक संदिग्ध समय में एक चींटी अपना खाद्य उद्देश्य  वहां घूम रहा था। व ये देखा ओर उनकी मन मे कपोत के प्रति दया भाव आया। जब व ब्याध अपना धनुष से बाण को छोड़ने ही वाला था उसी वक्त उसकी पाँव मे जाचोट मारा। ब्याध लक्ष्य भरस्ट हुआ और कपोत बच गेई। ये बात कपोत को अछि तरह पता था। ब्याध निरास होके चलागेया।

  समय बीतने लगा। एक दिन अचानक खूब बारिस हुई। बारिस का प्रकोप इतना ज्यादा था की पानी वहीं की वहीं बहने लगी। वही चींटी जो कपोत की प्राण बचाया था स्रोत मे बहता जारहा था। बस कुछ ही पल मे मरने ही वाला था। लेकिन उसकी कपाल तेज था। ऐसा एक संजोग मे वही कपोत जिस की व कभी जीबन बचाया था, देख लिया। व तुरंत एक पेड़ से पत्ता तोड़ के जल स्रोत मे छोड़ दी तो चींटी उसी के सहारे किनारा पकड़ा और उसका जीबन बच गेया।

  यहां से ये सिखने को मिलता है कि परोपकार का फल किसी भी रूप मे कभी न कभी जरूर मिलता ही है। तो हमेसा हमारे जीबन मे परोपकार करने का एक ब्रत होना ही चाहिए ।

  धनन्यबाद.....

  

   
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