टिडडी की खेद
शीत की ऋतु चल रहा था। उसदिन आकाश एकदम साफ था। सुबह की बेला।दिन की प्रथम प्रहर चल रहा था।चारोंओर सूरज की रक्तिम स्वर्णाभ शीतल आभा पड़ रहा था। थिर थिर मृदु समीरण अपना धीर धीर गति से हर पेड़ पौधे को छुतेहुए हिला हीला कर नाचतेहु जारहा था।परिबेस एकदम मन मोहक।सुखी पेड़पौधों मे भी कोमल पत्ता आजा -एगा। ये जाहिरसी बात हे कि एसा एक परिबेस हर किसी की जीबन मे एक नया उमंग लाएगा ही।
ऐसा एक मन मोहक माहोल का फायदा उठातेहुए एक टिडडी ने उत्तफुल्लित होके इस पौधे से उस पौधे झुमतेहुए गीत गारहा था। काफी खुश था व अपनी आप। ऐसा एक समय मे व एक दृश्य देखा की चींटियों का एक फौज जो लोग अति शालीनता के साथ एक के पीछे एक दलबद्ध होके अपना काम पे ब्यस्त थे। ऐसा मन मोहक परिबेस का कोई असर उनपे नहीं था।अपना समयानु -बर्तिता,कार्य-निष्ठता,सृनखलित तथा संगोश्ठी जीबन के तेहत वे अपने कार्य मे ब्यस्त थे। टिडडी उनके पास गई और ताछलय करके उनको हंसने लगा। बोला अरे निर्बोध चींटी की जात ऐसा एक परिबेस मे भी तुम लोग काम मे लगे रहते हो।क्या काम करना ही जीबन है। कुछतो समझो आनंद भी कोई चीज होता है।ऐसे ही काम करकर के मरजाओगे क्या।परंतु लो वे लोग उस वकत टिडडी को कोई जबाब नहीं दिया।अपना काम पे ब्यस्त ही रहे। टिडडी भी अपना काम मे चलतारहा।
शीत का बाद ग्रीष्म फिर बारिस की बेला आगई। जोर जोर से बारिस हिने लगा। ऐसा नहीं कि हमेसा ही बारिस होरहा था। कभी कभी रुक जाता था तो टिडडी इधर उधर जा के कुछ खालेता था।लेकिन एक बार लगातार तीन दिन तक बारिस होनेलगा।अब टिडडी खाएगी क्या। खाने के लिए उस की पास कुछ भी नहीं था।कब तक भुखापेट राहसक्ता था।जब पेट जलने लगा तो इधर उधर होके चींटियों के पास आपहंचा और बोलने लगा क्या करूँ भैयालोग,मेरा तो कपाल ही फुटा है लगातार बारिस हेतु मुझे भूखा रहना पड़ता है। कुछ तो रेहम करो आज खाना कुछ देदो।
दयाबस होके चींटियों ने कुछ खाना देदिया। फिर इसके उपरांत बोले कियूं भाई अब कुछ समझ मे आया । जीबन मजा मजलिस के लिए हे क्या ?अब टिडडी ने अपना भूल समझगया ओर सल्लज उन लोगों को शाबासी देनेलगा।
तो भाइयों आलस दुख का कारण है।समयानुबर्तिता और निष्ठापर उद्यम किसी को आत्म निर्भरबNसिल बनासक्ता है। इसिलए हमेसा जीबन मे आलस को छोड़ के हमेसा कर्म तत्पर रहना जरूर चाहिए ।
धन्यवाद.....
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