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मेरा पहला कहानी: मेरा फ़र्ज़

मेरा फ़र्ज़

लगभग तुम्हारी उमरकी एक लड़का।मेहज दसबारह सालका।अपना गाओंका पाठसालामे पढ़ाई करता था जो घरसे लगभग एक किलोमीटर दूरीपर था।उसवकत अब जैसा सड़क नहीं था।धूल कंकड़ से बनायाहुआ सड़क।बारिसकी महीना चलरहाथा।उसदिन स्कूलकी समय होगया था।अपना पुस्तक झोला लेके व लड़का पाठसालाकि और निकल -पड़ा।जरा जल्दीमैथा तो जानेकी वक्त गीलीमिट्टी में पाँव फिसलगेया।पूरीतरह गिलाहोगया,लेकिन आस्चर्य की बात यह है कि उसतरफ उसका ध्यान ही नहीं था।इस उम्र का लड़का के लिए ये कोई सामान्यसा बात नहींथा।फिरभी ओ पाठशाला में पहंचगई।मास्टर जी की दृष्टि जब उसपे पडा तो व बोले रामु इधर आओ।कौंन तुम्हारा ऐसा हालात बनादिया अब उसको जरूर दंड मिलेगा,सचसच बताओ।डरनेकी कोई बात नहीं।रामु मास्टर जी को सारीबात सचसच बतादीया तो गुरुजी समझगये ओर रामु को अपना कक्ष्या मे जानेको अनुमतिदेदीआ।

कुछही दिनकीबाद।दुर्गापूजा छुट्टी की अबसर मिला तब व बालक अपना सहपाठी ओर आसपड़ोसकी साथियों को लेके गाँव का उसी रास्ता को सारे गड्ढों को मिट्टी-कंकड़से भरदिया।समतुल बनाडाला।गाँव का हर लोग उसका कार्यको सरहनानेलगे।

व छोटा बालक फिर बडाहूआ।खूब पढाईकिया ओर गाँव का पाठशाला से पहला श्रेणी में पासहुआ।व एक अच्छा स्वभावका लड़का था।अपना दोस्तोंके साथभी उसका काफी अच्छासम्पर्क था।उसका मेलापी स्वभाव और अच्छा स्वभाव सभीको अपनिओर खींचता था।हरकोई दोस्त उसका कहा मानते था।उसका कोईभी बातको नकार नहीं सकतेथे।खेलकूद से लेके पढाईतक हरकाम मे व पारंगम था।दूसरों को सहायता प्रदानकरना उसका खुनमे बैठा था।कुलमिलाकर व एक चरित्रबान लड़का था।उच्च शिक्षया केलिए गाँव की कुछही दूर में एक कॉलेज में भर्ती होनेकेलिए उसके पास कोई संबल नहीं था।व गरीब था।उसका छोटी उमरमेही उसका पिता जी का देहांत होगया था।व माँ ओर बृद्धा नानी के साथ रहता था। माँ दूसरी घरका कामकाज करके जोकूछ लाती थी।उसी मे वे गुजारा करते थे।रामु की पढ़ाईकेलिए कोई पैसा नहीं था।ये सारीबातें गांव की कोईभी लोगोंको छुपिनेहीथी।तब गाँव का कुछ बिसिस्ट ब्यक्ति एकसाथ बैठे और सिद्धांत किये की जेसेभीहो वे लोग मिलके रामु को पढ़ाएंगे।सभीके मन मे ये एक भाबना था कि रामु एकन एक दिन गांव का नाम रोसन करेगा।व लोग एकसाथ रामकी घर जाकर माँ को सारीबात समझाये ओर वेसा ही हुआ।रामु कालेज मे पढ़ाई करनेलगा।कुछ साल बाद व एकडाक्टर बनकर निकला।

उस वक्त व चाहते तो उसका सरकारी नौकरी लग सकता था।लेकिन व ये नकार दिया।जानतेहो कियूं ,उसका ये समझ था कि जो गाँव की लोग उसको पढालिखाकर उतना बड़ा एक डॉक्टर बनाये उन लोगोंका सेबाकरना उसका फ़र्ज़ है।व फिर गाँव मे ही एक अस्पाताल बनाया और लोगोंको सेबा करनेलगा निषुल्क।धीरे धीरे दूर दूर से लोग उसका अच्छा काम को सरहनानेलगे ओर शाबासी देनेलगे।

इसी कहानीसे ये सिख मिलती हे कि अच्छा चरित्र और सेवाभाव द्वारा कोई भी एक अच्छा आदमी बनसकता है।ये आपलोगोंको हमेशा याद रखना जरूर चाहिए।
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