पगली
उस दिन बड़े सबेरे से स्नान सौच करके में निकल पड़ा था,गोरखनाथ शिबालय की ओर जो मेरे घर से लगभग चालीस किलोमीटर दूरीपर है। बस मे सफर करने के बाद पहंचगेया हनुमानपुरा बस स्टैंड पर। लोगों को पूछा तो जानने को ये मिला की वहीं से दक्षिण की ओर एक किलोमीटर पड़ेगा मंदिर। में उस्तरफ चलनेलगा। कुछही दूर जाने के बाद देखने को ये मिला की एक बड़ासा बट बृक्षय की निच्चे गाँब की कुछ बच्चों ने एक महिला के ऊपर ढेला प्रहारते हैं। महिला चिल्लारहा है। कभी कभी गाली कररहा है। पास जा के में समझा की बच्चों ने एक पगली की ऊपर दुर्ब्याभार कररहे हैं। उस की ये हालात देख के मुझ मैं दया भाव आगेया तो उन बच्चों लोगों को में समझा बुझा के कहीं दूर भेजदीया। तब वहां पगली और मेरेसिबा कोई नहीं था।
सएकदम दुबली पतली सी। जुल्फें जट बनचुकि थी। फटे हुए साड़ी गंदगी मे भरपूर बद्दू,निकलता हुआ। आंखे पाताल पे था। अति दुर्बल,अस्थि पंजर साफ गिनाया जासकता था। सरीर की कई हिस्सों से खून निकल रहाथा। अपनी आप कुच्छ बातें कहरहा था,जो सुनने मे अस्पष्ट था।
सएकदम दुबली पतली सी। जुल्फें जट बनचुकि थी। फटे हुए साड़ी गंदगी मे भरपूर बद्दू,निकलता हुआ। आंखे पाताल पे था। अति दुर्बल,अस्थि पंजर साफ गिनाया जासकता था। सरीर की कई हिस्सों से खून निकल रहाथा। अपनी आप कुच्छ बातें कहरहा था,जो सुनने मे अस्पष्ट था।
जब मैं मेरे रास्ते मे जानेको प्रयत्न कररहा था। अति क्षीण स्वर मे व मुझे कुच्छ ऐसा कहनेलगी। बाबू जरा मेरा कहानी सुनोगे। मैं आस्चर्य चकित बंनगेया। समझ मे नहीं आरहाथा,कौं की मेरे अंदाज की विपरीत एक ऐसा घटना घटित होराहाथा। मैं सोचनेलगा,कैसे ऐसे बात मुझे एक पगली बोल सकता है। मेरा उत्सुकता बढनेलगा। फिर में पासगेया तो व बैठनेकेलिये बोला। मैं कुछदुरिपर बैठगेया तो व अपना जीबन कहानी बखानतेगया।
सुनो बाबू,न मैं पगली थी न अब हूँ। मुझे पगली बनायागया है। मैं पूछा व कैसे? तो जवाब में व बोला, मैं मीरा हूँ। इसी गांब की बहू। मेरे पति एक सिधिसधी आदमी थे। हमारे सादी आज से छे साल पहले हुईथी। घर मे हम पतिपत्नी के लाबा और कोई नहीं थे। मेरा पति हर रोज सेठ का काम करते थे। मैं भी उसका साथ वहीं पे काम करती थे। ऐसे ही हमारा सुखी संसार चलरहा था। वेसे ही एकदिन हमारेलिए समय मौत बनकर आया। मेरे पति बाजार से आनेके वक्त सड़क दुर्घटना मे चलेगये। आस पड़ोस के लोग और सेठ की सहायता से अंतिम संस्कार समापित हुआ। ऐसे कुछ दिन बिदजाने के बाद,सेठ ने मुझे अकेले मैं बुलाके मेरा सतीत्व अपहरण करनेका कोशिश किया। मैं जैसेतैसे वहीं से दौड़ भाग निकला। किसीको कुछ बतायातक नहीं थी। उसदिन साम को सेठ गांब की मंदिर मे सभा बैठाया तो मुझे वहीं पे बुलायागेया। गांब वालों के उपस्थिति मे ये फैसला लियागेया की में एक पगली हूँ। मेरेसाथ किसीको भी बातचित करना मना। कोई मुझे किसी भी प्रकार का सहयोग नहिं करेंगे। सभी लोग तबसे मेरेसाथ वेसा ही करते आरहे हैं। ऐसे करके मुझे एक पगली करार दीयागेया। अभी मैं वेसे एक पगली की अभिनय करनेको मजबूर हुँ। तबसे गाँववाले भी मुझे पगली ही समझते हैं।
पगली से ये सारे बात सुनने के बाद मुझे तुरंत नजदीकी महिला असहाय केंद्र जो एक सामाजिक अनुश्ठान वहां जा के बातचीत करने को जानापडा। वे लोग भी पगली को वहीं पे रखने लगे। कुछ ही दिन बाद पगली बिल्कुल मीरा बनके अब समाज सेवा मे ब्यस्त है।
लेकिन यहां मेरा आप को एक प्रश्न है। समाज मे मीरा जैसा और कितनी लड़कियां इसिहालात का सिकार नहीं होतेहोंगें। तीन मुँह मे आखिर कितने दिनतक बकरी को कुत्ता बनाया जाएगा। कृपया कमेंट बॉक्स मे लिखिए।
धनन्यबाद.....


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