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साधारण ज्यान

साधारण ज्यान




  मदनपुर बस्ती मे एक परित्यक्त झुपड़ी में राधु और बृद्धा माँ रहते हैं। राधू एक अनपढ़ गबांर लड़का। बचपन से ही पढ़ाई लिखाई पर मन नहीं। केबल खेलना कूदना,ईधर उधर घूमना और जायदा समय सोते रहना उसका जीबन चर्या का एक एहेम अंग है। गरीबी तो नस मे बैठा रहाथा। जैसे तैसे माँ किशिकी कामकाज करके घर चलालेते थे। अब ये काम माँ की बस मे हे काहाँ। दुर्बल होचुकी है। आर्थिक संकट हेतु अब दिन दिन चुला जलतातक नहीं। मजबूरी मे है जीबन।
  अब व बड़ा होगेया है। अठारा साल की उमर लेकिन स्वभाव मे जैसी की तैसी कोई परिबर्तन ही नहीं। घर की हालात पर कोई चिंता नहीं। अपना मनमर्जी काम मे लगिरहति। फिर भी उनका ये एक अच्छि स्वभाव है की कभी भी माँ को किसी काम के लिए तंग नहीं करती।

  उस रात घर मे बनानेकेलिए कुछ नहीं था तो दोनों माँ बेटे को भुखापेट रहनपडा। राधू तो सोगेया लेकिन माँ को नींद काहाँ से आएगा। रातभर सोचनेलगी की राधू उसकी उपरांत जिएगा कैसे। ऐसे ही सोचते सोचते रात खत्म हुई।

  सुबह माँ राधू को बोला बेटा राधू आज तुम्हे एक छोटासा काम करना होगा। हात मे एक टोपी देके राधु को बोला,इसे तुरंत बेचके आओ। जल्दी आना ,नहीं तो तबतक चुला नहीं जलेगा। और एकबात ,ध्यान देके सुनलो, जैदा बोलनेवाले या फिर बिल्कुल नाबोलने वाले को टोपी मत बेचना । राधू हाँ भरके तुरंत अपना काम मे निकलपड़ा।

  रास्ते मे जब कभी किसीको देखता तो बोलता,"सरजी टोपी लेलो ,आपको खूब सजेगा।" लोग मनाकरके चलेजाते। उन मे से एक ब्यक्ति दाम पूछा तो राधू दस रुपैया बोलने से कहा,थोड़ा कम होनहीं सक्ता क्या। राधू सोचा,ये ब्यक्ति जैदा बोलनेवाला ऐसा लगरहा है तो इसे टोपी नहीं बेचनी चाहिए ,सोच के आगे चलपडा।

  घूमते घूमते साम होगेया तो सोचनेलगा की अब क्या किया जाए। देखा की नजदीकी  पेड़की नीचे एक प्रतिमूर्ति खड़ा है। पासजाके बोला, भाई साहब टोपी तुम लेलो। लगता है दिनभर तुम वैसेही धूप मे ही खड़ा रहते हो,बहत काम मे आएगा। लेकिन प्रतिउत्तर कुछ नहीं था। व सोचनेलगा,सायद आज भाई साहाब का मन दुःख मे हैं। इसीलिए बातकरना नहीं चाहते। फिर बोला ठीक है कोई बात नहीं ,में कल ही आके आपसे पैसा लैलूंगा। वेसा कहके सरपे टोपी पहनादिया और घर चलागेया।

  अगली दिन झट प्रतिमूर्ति की पास आपहंचा। उस वक्त उसकी सरपे टोपी नहीं थी। प्रतिमूर्ति को पैसा देनेको कहा। प्रतिमूर्ति कुछ नहीं बोला तो व क्रोधित होके मुहँ मे एक मुक्का मारा तो सर धड़ से अलग होगेया। उनमेसे एक थैली निकला जहां कुछ पैसा था। राधू व पैसा लेके घर पहंचगेया।

  कुछ दिन चलागेया। माँ राधू को बोले। राधू बेटा, तुम काल से धोबी के पास काम करने जाओगे। पहले कुछ नहीं मिलेगा मगर काम सीखने के बाद कुछ मजूरी जरूर मिलेगा। वेसा ही हुआ। राधू धोबी की पासगेया । धोबी कुछ कपड़े देके नदी से धोडालने को राधू को बोला। राधू नदी मे जाके कपड़े धोनेलगा। धोते धोते बहत समय होचुकी है, लेकिन आनहिं रहाथा। कारण ये था की व जान नहीं पारहाथा की कपड़े साफ हुआ है या नहीं। ठीक उसी समय एक केवट अपना नैया मे सबारी लेके जारहाथा। उसे देख के राधू जोर से चिल्लानेलगा, जरा जल्दी आओ । केवट सोचा की सायद कोई मुसीबत मे है तो तुरंत आपहंचा। कारण पूछा तो क्रोधित होके अपना डंडा से मारा। इतिनि सी बात केलिये तूने मेरा समय बर्बाद किया। ये था जल्दी आना का बात । तब राधू बोला ,मुझे क्या बोलना था। केवट बोला भागजाओ। राधू व बात रटते रटते घर की ओर चलनेलगा।
  कुछ ही दूरीपर एक शिकारी चिड़िया शिकार केलिए अपना लक्ष्य भर रहाथा। राधू की भागजा भागजा सुनके जब चिड़िया उड़गेया तो शिकारी राधू को "बदमास भागजा बोलता है" बोल के मारनेलगा। तब राधू पूछा मुझे क्या बोलना था। सीकरी बोला मरजाओ। फिर राधू वेसा ही बोलके अपना रास्ते मे चलनेलगा। कुछ ही दूर देखा की दो लोग आपस मे लड़ लैहेहैं। जब वे ये सुना ,"मरजाओ" तुरंत लड़ाई बन्द करके राधू को मारनेलगे। फिर उनको राधू पूछा की उसे क्या बोलना था तो वे बोले "बिछोड होजाओ"।

  तब राधू समझपाया की एक ही बात हमेसा बोलना गलत है। समय,काल,पात्र के अनुसार बोलती भिन्न भिन्न होता है। फिर व और आगे एसा भूल नाहीकिया। हमेसा कुछ बोलने से पहले अपना साधारण ज्यान को उपोयग करता है। सफलता का राहोंपे चलता रहता है।

धनन्यबाद.....



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