लक्ष्य की ओर
रामधन किशन नगर मे रहते हैं। तीन बेटें और पत्नी के साथ एक खुसी की संसार चलता है। साधारण सा मध्यवित्त परिबार। गांब मे अपना चार बिधा जमीन। अकलान्त परिश्रम करते हैं। परिसानी की कोई गुंजाइश ही नहीं सिबाय एक बात की वह ये हे की अपनी तीन बेटों राम,दाम और श्याम काफी बड़े हो चुके हैं लेकीन फिर भी कमाने कुठाने मे उनके मन ही नहीं। पढ़ाई लिखाई मे भी उतना अच्छा नहीं। कैसे बचेंगे ये सारे बस हमेसा सोचते रहते हैं, रामधन। जितिना बच्चों के उम्र बढ़ता जारहा है। उसका भी परिसानी बढ़ता ही जारहा है। अब उनके उम्र भी सादी बिहा की हो गेया है फिर भी कमाने मे ध्यान ही कहाँ। इधर रामधन अपना चतुर्थ अबस्था मे पहंच चुके हैं।
एक दिन साम को सारे बच्चों को पास बुलाये और कहा,"मेरे प्यारे बच्चों,देखो अब तुम लोग बड़े होगये हो,मेरा ये एक बात ध्यान देके सुनलो। कलसे तुम लोग अपनी आप अपना अपना धंदा तै करलो। मैं तुम सभी को एक एक लाख रुपैया कुंजी की रूप मे दूंगा। उसे सही तरीके से खटाना और अपना धंदा को आगे लेजाना तुम्हारा जिम्मा है। ठीक है। कलसे ही तैयार होजाओ। मेरा तुम से बस इतना ही कहना है।"अगली दिन बैंक से पैसा निकाल के सभी को एक एक लाख रुपैया देदिया।
बच्चों लोग उत्सुकता की बस उस वक्त पैसा तो लेगये मगर तबसे सोचने लगे की करें क्या? सभीने मन ही मन भाबते गये की क्या करने से क्या होगा। कोन सा धंदा जैदा फैदामंद होगा। श्याम ईसी के बारे मे अपना दोस्त,रिस्तेदारों और आसपड़ोस की लोगतक पुछडाला। सभी ने अपनी अंदाज मे एक एक सुझाब देनेलगे। व समझ नहीं पाया,कोनसा सुझाब उनकेलिये सही साबित होगा तो उलझन मे फँसगेया और कोई काम प्रारम्भ ही नहीं किया।
दाम दूसरा बेटा,रिस्तेदारों,बंधुपरिजन को पूछ के सलाह लेके एक आलू की दुकान प्रारम्भ किया। सारे पैसा खटाया। अपना बुद्धि नहीं खटाया। दोस्त,परिजनों के अनुसार अपना ब्यबसाय चलाने लगा। कुछ दिन बाद देखागेया की लाभ कुछ भी नहीं होरहा है बरंग सारे पैसा डूब गेया है। क्या करें सोच रहा है। अपनी आप को दोष देके दुःख की मारे रोरहा है।
तिसिरा बच्चा राम,थोडासा पढ़ा लिखा था। पिताजी से जबसे पैसा लिया तबसे किसी को कुछ नहीं पूछा। बगैर किसी की सलाह बिना गांब मे ही एक साड़ी की दुकान प्रारम्भ किया। पहले से ही गांब और आसपास कोई ऐसा दुकान था ही नहीं तो ढ़ेर सारे साड़ियां बेच के काफी कमानेलगा। देखते ही देखते एक सेठ बनगेया।
यही से ये सिख मिलती हे की अपना सामर्थ्य और आग्रह मुताबक जो कोई भी निरंतर लक्ष्य की ओर बढ़ता हे वह सफलता का स्वाद चखता है।
यही से ये सिख मिलती हे की अपना सामर्थ्य और आग्रह मुताबक जो कोई भी निरंतर लक्ष्य की ओर बढ़ता हे वह सफलता का स्वाद चखता है।
धन्यवाद.....


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