सेवा का महत्व
वेसे तो ये हम सब जानते हैं की भारतीय सभ्यता और परंपरा एक महान तथा अनौखा ही है। हमारे कला से लेके संस्कृति और दर्शन से लेके धर्म भावना तक महानता का परिचय मिलता ही है। हमारा दर्शन धरती मे सबसे पुराना और सबसे उत्कृष्ट ,ये सर्ब्जन बिदित है, जो मुनिऋषियों के घोर तप तथा तर्क निसृत फल ही है। आज भी मानब और मानब जाती का कल्याण के लिये एक अमोघ अस्त्र है।
भारतीय परंपरा का जिक्र कियाजाए तो शिक्षया का परंपरा सबसे अनौखा ऐसा प्रतीत होता है। जहां गुरु शिष्य का पिता ऐसा मानाजाता था। अपना पुत्रबत गुरु शिष्य को मानते थे। उसका पढ़ाई लिखाई से लेके रहन सहन का सारे जिम्मा गुरु लेतेथे। एक साधारण शिषु को इंशान बनाने मे गुरु का भूमिका अतुलनीय था। अपना शिक्षया समाप्ति के बाद शिष्यों ने गुरु से अनुमति लेके घर जाते थे और ग्रहस्थाश्रम मे प्रबेश करके अपना सामाजिक दायित्व निभाते थे,ये था हमारा गुरुकुल प्रथा।
भारतीय परंपरा का जिक्र कियाजाए तो शिक्षया का परंपरा सबसे अनौखा ऐसा प्रतीत होता है। जहां गुरु शिष्य का पिता ऐसा मानाजाता था। अपना पुत्रबत गुरु शिष्य को मानते थे। उसका पढ़ाई लिखाई से लेके रहन सहन का सारे जिम्मा गुरु लेतेथे। एक साधारण शिषु को इंशान बनाने मे गुरु का भूमिका अतुलनीय था। अपना शिक्षया समाप्ति के बाद शिष्यों ने गुरु से अनुमति लेके घर जाते थे और ग्रहस्थाश्रम मे प्रबेश करके अपना सामाजिक दायित्व निभाते थे,ये था हमारा गुरुकुल प्रथा।
थोड़ीसी पुराने जमाने की बात। ऐसे एक गुरु आश्रम मे लोकसेबक और भक्तबन्धु बोल के दो शिष्य पढ़ते थे। एक साथ रहते थे ,खाना खाते थे,गुरु आजन्या मुताबक सारे काम मिलकर करते थे,फिर भी उन के ब्यक्तित्व की दृश्टिकोण से ढ़ेर सारे भीन्नता था। आग्रह,चिन्ताधारा,भावना तथा बिस्वास मे दोनों एक दुसरे से बिल्कुल अलग थे। उनलोगों मे एक बात मे ये एक समानता था की दोनों आस्तिक थे। भगबान पर प्रगाढ़ बिस्वास दोनों के था।
लोकसेबक का धारणा ये हे की भगबान को प्राप्त करनेकेलिये सबसे उत्कृष्ट और सरल मार्ग कर्म योग ही है। उसका बस यही एक बिस्वास हे की अच्छा कर्म ही किसी को अच्छा फल दिलासक्ता है। इसीलिए व हमेसा इस बात पर ध्यान रखतेहुए अपनी आप को जन सेवा मे नियोजित करता है।
भक्तबन्धु का धारणा लेकिन लोकसेबक से सम्पूर्ण उल्टा,व समझता है, केबल भगबान का सेवा पूजा और भक्ति की बलपर भगबान को प्राप्त कियाजासक्ता है। इसीलिए व अपनी आप को हमेसा भगबान की सेवापूजा, नामसंकीर्तन मे नियोजित करता। बाहर दुनियां से बिल्कुल अलग एक जीबन जी रहा था।
ऐसा भी होता था। कभी कभी जब दोनों कहीं पे मिलते थे तो भक्तबन्धु हमेसा अपना दोस्त को याद दिलातेहुए कहता था,"देख लोकसेबक मेरा बात समझले, कियूं अपनिआप को दुनियादारी मे नियोजित करते हो। ऐसा करते जाओगे तो अपना रास्ते से भटक जाओगे। तब तुम्हारा जो जिबन का अंतिम लक्ष्य इस्वर प्राप्ति का क्या होगा।" लोकसेबक निरब रहता लेकिन अपना रास्ते मे लगेराहता। जैसे भी हो दोनों अपना अपना काम मे सच्चा और अच्छा ही थे।
भक्तबन्धु का धारणा लेकिन लोकसेबक से सम्पूर्ण उल्टा,व समझता है, केबल भगबान का सेवा पूजा और भक्ति की बलपर भगबान को प्राप्त कियाजासक्ता है। इसीलिए व अपनी आप को हमेसा भगबान की सेवापूजा, नामसंकीर्तन मे नियोजित करता। बाहर दुनियां से बिल्कुल अलग एक जीबन जी रहा था।
ऐसा भी होता था। कभी कभी जब दोनों कहीं पे मिलते थे तो भक्तबन्धु हमेसा अपना दोस्त को याद दिलातेहुए कहता था,"देख लोकसेबक मेरा बात समझले, कियूं अपनिआप को दुनियादारी मे नियोजित करते हो। ऐसा करते जाओगे तो अपना रास्ते से भटक जाओगे। तब तुम्हारा जो जिबन का अंतिम लक्ष्य इस्वर प्राप्ति का क्या होगा।" लोकसेबक निरब रहता लेकिन अपना रास्ते मे लगेराहता। जैसे भी हो दोनों अपना अपना काम मे सच्चा और अच्छा ही थे।
कुछ बर्ष उपरांत,दोनों का देहांत हुआ। दोनों को स्वर्गलोक लियागेया। दोनों को एक एक स्वर्ण मुकुट पहनायागेया ,लेकिन लोकसेबक की मुकुट मे हीरा,नीला,मोती,माणिक से भरा खाद लगाहुआथा। इसी के बजह से जैदा सुंदर लग रहाथा। यही एक बात भक्तबन्धु को बार बार उलझन मे पकारहाथा की अपना दोस्त कोई सेवा पूजा ,भक्ति कर नहीं रहाथा। हमेसा अपनी आप को दुनियादारी मे नियोजित कर रहाथा फिर भी पुरस्कार की रूप मे लोकसेबक को ही कियूं उन से जैदा सुंदर मुकुट पुरस्कार दीयागेया। उसका ऐसा एक भ्रांत धारणा पैदा हुआ। व तुरंत इसका विरोध करने लगा।
आखिर मे दोनों को भगबान का पास लायागेया। सारे बात समझते हुए,भगबान अपना विचार व्यक्त करनेलगे और बोले,"देखो भक्तबन्धु ,लोकसेबक मेरेलिए दो काम किया है। व हे सेवा और भक्ति जब की तुम केबल एक काम भक्ति मे ही सिमतगये हो। इसीलिए जो पुरस्कार उसे मिला है बिल्कुल सही है। यथार्थ है।" अब भक्तबन्धु अपना भूल समझपाया की कैसे भक्ति से सेवा का महत्व बड़ा है।
यही से ये सिख मिलती है की केबल भक्ति मार्ग किसी एक ब्यक्ति को अपना जीबन सार्थक बनानेकेलिये समर्थ बनासक्ता है। ब्यक्ति को स्वार्थ केंद्रीक बनाता है। दूसरे मे सेवा भाव ब्यक्ति को निःस्वार्थपर बनानेकी साथ साथ हर एक की पीड़ा और आनंद को अपने मे अनुभब करने को मौका देता है। हर भूत मे परमात्मा की स्थिति को उपलब्ध कराता है।
धनन्यबाद.....



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