दॄष्टिकोण
भगबान दाश गोपीपुर मे रहते हैं। संग बृद्धा माँ और बेटी कमला। पहले से ही पत्नी का देहांत होचुका था। एक रक्षयनसिल ब्राम्हण परिबार। हर रोज घर मे पूजापाठ चलता रहता। साम मे भागबत पाठ तथा आलोचना एक नियमित रीति है। भागबत पाठ के समय आस पड़ोस की ढेर सारे लोग संबिलित होते हैं। ठीक उसी समय दादी माँ हमेसा कमला को पास बुलाती और चुपचाप बैठनेकेलिए तागित करती। कमला भी दादी माँ का बोल मानती,आके चुपचाप चर्चा खत्म होनेतक वेसे ही बैठी रहती।
दादी माँ की दबदबा हमेसा परिबार पर रहता। बेटा भगबान दाश कभी भी माँ की बात नहीं काटते। माँ जबकभी कोई भी बात बोलती तो एकदम सरल बालक की भांति मानजाते। व नहीं चाहते कि माँ की मन मे उसकी बजह से किसी भी प्रकार का दुःख पहंचे। दादी माँ की निगरानी मे पलिबढी कमला का स्वभाव भी अनुरूप ही है।जब कभी कहीं पे जाए तो दादी माँ की अनुमति बराबर लियाकरती। नहीं तो नहीं।
गाँब मे पहले कोई पाठशाला नहीं था। अब सरकारी सहायता से एक प्राथमिक विद्यालय बनचुकि है जहाँ गाँब की बचेंलोग पढ़ाई करते। रामसरण इसी ही स्कूल मे सिक्ष्यक है जो दूर की एक सेहर कृष्णप्रसाद से हैं। गाँब से दूरी और गमनागमन की समस्या हेतु वहीं गाँब मे ही राहजाते हैं।
सिक्ष्यक के रूप मे रामसरण एक प्रबीन सिक्ष्यक है ही,साथ ही समाज सेबा का भाव तथा मेलापी स्वभाव का धनी भी। जब स्कूल समय खत्म हो जाता व गाँब मे घूमते हैं। काफी सारे लोगों को तरह तरह की सलाह देते ताकि लोगों की जिंदगी मे कुछ प्रगति हो सके। हमेसा यही उनका एक इच्छारहता। हर रोज शाम की समय मे भागबत चर्चा मे शामिल होते। धीरे धीरे भगबान दाश का परिबार की साथ इनका संपर्क और घनिष्ट बनता गेया। गाँब की लोगोँ के साथ भी अच्छी संपर्क बनता गेया। सारे लोग मास्टर जी को अपना परिबार का सदस्य जैसे मानते थे। हर काम के लिए उनसे सलाह लेते थे। इसी क्रम मे मास्टर जी गांबबालो को आधुनिकता के प्रति होनेवाला भ्रांत धारणा को खत्म करके एक सकारात्मक सोच को उजागर करने मे लगेरहते। हर किसीके लिए शिक्षया, परिबेश स्वच्छता,स्वास्थय रक्षया,रोग से मुक्ति के लिए डाक्टरी परामर्श,नारी शिक्षया का महत्व आदि बिसय मे लोगों को जागरूक करना उनका एक रुचि बनगेया था।
जैसे जैसे समय बीतता जारहा था। मास्टर जी का गांबबालों के साथ संपर्क और बढनेलगा। फिर भी सबसे अधिक संपर्क था भगबान दाश के साथ।हर रोज मास्टर जी भागबत चर्चा मे आते ही रहते थे। अब कमला बड़ा हो गेया है, पंद्रह साल का उम्र लेकिन अभीतक उनकी पढ़ाई सुरु भी नहीं हुई थी। जब इसी बारे मे व जानपाये तो भगबान दाश को समझाने लगे ," पंडित जी आजकी जमाने मे निरक्षयर रहना भी एक पाप है। गबार रहना कोई कपाल का रेखा नहीं है। एक भ्रांत धारणा ही है। आप तो ये जानते होंगे कि जीबन मे पाठ सास्त्र की कितिना महत्व है। फिर आप कमला को कियूं अनपढ़ बनाते हो। आप चाहें तो मे कमला को पढ़ाऊंगा।"
बात सुनते ही दादी माँ कहनेलगी ,ये कैसा एक बात है मास्टर जी । बिल्कुल गलत बात। घोर असुभ ही असुभ। हमारे परिबार मे कोई लड़की पढ़ाई नहीं करता। ये एक बंश परंपरा,इसे तोड़ा जा नहिं सकता। जब कभी कोई लड़की पढ़ाई करती तो उसकी पिताजी का मौत होजाती। जानते हुए मे वेसा नहीं होने दुंगी कियूं की मैं अपना बेटा को खोना नहीं चाहता।
इसी बात को लेके काफी बाद बिबाद चलने लगा लेकिन आखिर मे ये तय कियागेया की कमला को पढ़ाया जाएगा। कमला उत्सुकता लेके पढ़ने लग गई। ठीक उसी समय मे गाँब मे महामारी लग गेया और साथ ही भगबान दाश का देहांत हो गेया।कमला की जीबन मे और एक बड़ा समस्या आगेया। घर मे कमला और बृद्धा दादी माँ के सिबा अब और कोई पुरुष ब्यक्ति नहीं थे। दादी माँ कमला को हमेसा कटु भाषा मे गाली करती थी। कहती थी कि उसकी पिताजी की मौत की कारण कमला स्वयं ही है। इस बात पर कमला रोती। दुःख मे ही जीबन जिरहि थी। कभी कभी मास्टर जी घर आके हाल चाल पूछ लेते थे। कमला की पढ़ाई ठप होगेई,व अब घर का काम काज करती थी।
लोग कहते हैं न ,"मुसीबत जब आता है, चारों तरफ से आता। ऐसा ही हुआ कमला के साथ। कुछ ही दिन बाद पुत्र बियोग मे रोरो के दादी माँ चल बैठे। अब कमला की पाश और कोई आत्मजन नहीं रहगये। दिन रात घर मे रोता ही रहता । कैसे चलेगा उसकी जीबन हमेसा एक ही सबाल मन ही मन आजाता था। ऐसा एक दिन भी आएगा उसकी जीबन मे ये उनकी सोच की बाहर थी। इधर मास्टर जी काफी परेशान थे। कैसे कमला का मुसीबतों को हल कियाजाए सता रहा था। कौन सादी रचाने को तैयार होगा कमला जैसे गबार,गरीब तथा मातापिता हीन लड़की को। परिशेष मे व निश्चित करलिये की व स्वयं कमला को बिबाह करेंगे। वेसा ही हुआ ।अब मास्टर जी की महत अनुकम्पा हेतु कमला का जीबन कमल सा बन गई।
यही से ये सिख मिलती है कि जीबन परिबर्तन मे दॄष्टिकोण परिबर्तन का आबस्यकता जरूरी बनजाता है।
धन्यवाद.....
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