क्रोध क्षयान्ति
पुराकाल की बात। देबभूमि एक बडासा राज्य,जिसका राजधानी था साधुनगर। बीरभद्र थे राज्य का राजा। स्वभाव से राजा थे एक प्रजा बस्सल और न्याय प्रेमी। हमेसा धर्म और न्याय संगत रीति-नीति से अपना राज्य चलाते थे। प्रजाओं के दुःख को अपना ही समझते थे ।प्रजागण काफी खुशहाल जीबन जिरहते थे। राजा बीरभद्र का शासन प्रणाली ऐसा था की राज्य मे एक भी ब्यक्ति कभी भुखापेट नहीं रहते थे या कहिंपे एक भी कोई भिखारी देखने को नहीं मिलते थे। ये था राजा बीरभद्र का एक सबसे बड़ा बिशेषता। कभी भी किसी हालात मे किसी एक भी प्रजा दुख मे नारहें इसिलए हमेसा परिसद गण सजाग और निरंतर प्रयास मे रहते थे।
शासन कार्य सुचारू रूप से चल तो रहाथा मगर कुछ दिनों से राज्य मे चलनेवाला नियमित चोरी की घटनाएं सारे प्रशासन को तंग करचुकाथा। प्रशासन की बिधिबद्ध प्रयास से भी कोई सुफल मिल ही नहीं रहाथा। राजा बीरभद्र चोरों को पकड़ के दरबार पे लानेको हुकुम देदिये। साथ ही गुप्तचरों को भी नियुक्ति कियागया। परिशेष मे चार चोर पकडे गये दरबार पे पेश कीयेगये। उनपर मुकद्दमे भी चलायागेया। दोषी साब्यस्त होने पर चोरों को दोषी करार दीयागेया और दंड की रूप मे फांसी की सजा। दिन भी तै कियागया।
फांसी की दिन कुछ परिसद बर्ग और घातक गण वहीं पर उपस्तित थे। चार चोरों को बंदिसाला से लायागेया।अंतिम इच्छा पूर्ति करनेके बाद फांसी मे लटका जारहाथा। एक के बाद एक कर के तीन को फांसी की सजा मिलचुकि थी। अब बारी था चौथा और अंतिम चोर का। जब उसे उसकी अंतिम इच्छा के बारे मे पूछा गेया तो व बोला,"मेरे पास ऐसा एक बिद्या है जो मेरे बिना और कोई नहीं जानते तो मेरे मरने से ये बिद्या हमेसाकेलिये जग से निष्चिन होजाएगा। इसीलिए तुमलोग तुरंत जाके राजा को ये बात बताओ।" पारिसद गण चोर की बात पर हंसनेलगे। फिर चोर बोला,"अरे हंसते कियूं हो ,ये सच्ची बात है। जब ये बात राजा को नहीं बताओगे और मुझ को फांसी मे लटका दोगे इस के बाद राजा जान के तुम्हे फांसी पर नां चढ़ायें ऐसा ही मेरा इच्छा है।" चोर की बात सुनकर परिसद गण सोचनेलगे, सायद वेसा भी हो सकता है तो हमे कियूं मनमानी करना है। ऐसा ही सोच के राजा को सारे बातें अबगत करादिये। राजा फिर सोचनेलगे सायद हो भी सकता है। जो भी हो चोर से व बिद्या की बारे मे समझना चाहिए। ऐसा सोच के उन के समक्ष्य लाने को आदेश किये। चोर को लायागेया। राजा चोर को पुछनेलगे की कौन सा बिद्या की बारे मे व जानता है।चोर बोला,"सोना उगानेका बिद्या"। सुनके राजा आष्चर्य चकित बन बैठे। फिर भी बिस्वास रख के प्रासाद की बगल मे ही स्थित जमीन पे सोना उगाने का बंदोबस्त करवादीया।
जमीन की तैयारी होचुकी थी। बीज के रूप मे कुछ तुकुड़े सोना भी राजा दीये। परिसद गण चोर को सोनेकी बीज लगाने को कहा। चोर बोला,में तो चोर हुँ मेरे लगाने से सोने का पेड़ नहीं उगेगा। कोई सम्पूर्ण साधु जो जीबन मे कोई गलत काम किया ही नहीं व बीज बपन करने से ही सोने की पेड़ उगेगी नहीं तो नहीं।
इसी काम के लिए, हरकोई को सूचना दीयागेया मगर कोई एक भी नहीं आये। फिर परिसद गण को कहागेया ,व लोग भी अपनी आप को गलत एहसास कर रहेथे। खुद राजा को अनुरोध कियागेया मगर व भी अपना स्वच्छता प्रति संका में थे।आखिर मे उसी विचारक जो उनको सजा सुनायेथे उनको बोलागेया व भी अपनी आप को गलत समझ रहेथे। ऐसा एक माहोल सभी को निस्तब्ध करदिया।
तब जाके चोर बोलनेलगा की सारे तो गलत ही है फिर "मुझे ही कियूं चोर करार दिया गेया"। सभी ने अपना गलती समझगये और व चोर को सरहनानेलगे।राजा दोष वापस लेलिये और इनाम प्रदान किये।
यही से ये सिख मिलती है की कैसे किसी का क्रोध क्षयान्त किया जासकता है।
यही से ये सिख मिलती है की कैसे किसी का क्रोध क्षयान्त किया जासकता है।
धन्यवाद.....
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