बुद्धिम जस्य बलं तस्य
राजा उद्यम सिंह दुर्गम गड का राजा प्रबल प्रतापी। बहत बड़ा सा राज्य का राजा। धन दौलत,पराक्रम किसी मे भी कमी ही नहीं। केबल एक ही चिंता हमेसा सताता रहता था की उसका कोई औलाद ही नहीं। कौन सम्हालेगा राजगद्दी उनकी उपरान्त। एक बेटा के लिए एक नहीं चार चार रानियां बिबाह करचुके हैं। फिर भी कोई औलाद का सुख नहीं था। अब राजा के पास उतना उम्र भी कहाँ रहगया है की व फिरसे इसीबारे मे और एकबार प्रयास करसके। अपनी आप को पिता कहलाने के लिये क्या कुछ नहीं करचुके थे। पूजा पाठ,हजारों ब्राम्हणों को भोजन की साथ साथ लाखों लोगों को दान देने के बाद अब जाके एक संतान प्राप्त हुआ है व भी एक बेटी। जिसका नाम चंद्रप्रभा।
रूप,गुण से लेके हरचीज मे उसकी कोई जवाब नहीं। पाठ सास्त्र मे भी काफी प्रबीन। बल,बुद्धि,कौसल हर क्ष्येत्र मे निपुणता मे कोई संका ही नहीं था। धीरे धीरे चंद्रप्रभा का उम्र बढता चलागेया और साथ ही एक समान्तराल मे उसकी सुगुण का सुगंध सारे ओर महकने लगा था।
अनगिनत राजकुमार उनकी रूप गुण पे आकृष्ट हो कर बिबाह प्रस्ताब भी भेजनेलगे मगर चंद्रप्रभा का एक ही सर्त था की व ऐसा एक राजकुमार की साथ बिबाह रचाएगी जो बल से नहीं बुद्धि मे पारंगम हो। राजा उद्यम सिंह भी बेटी को दुःखी देखना नहीं चाहते थे तो पुत्री की सलाह लेके अपना राज्य तथा आसपड़ोस राज्यों मे भी ये खबर फैलानेको राज कर्मचारिओं को आदेश देदिये। सर्त ये थी की ब्राह्मण से लेके चांडाल तक जो भी अपनी बुद्धि की सर्बश्रेष्ठ पराकाष्ट दिखाएगा,राजकुमारी उस को ही बरमाला पहनाएंगे। इस के लिए एक तारीख तै कियागेया।
राजा एक बडासा सुंदर कौसल साला भी बनवाए जहाँ अपनी राज्य और अन्य राज्यों से आमन्त्रित अतिथिगण समारोह को देख के आनंद उठासकें। सजाबत एकदम मन मोहक लग रहा था।
उसदिन ढेर सारे दर्शक उपस्तित हो चुके थे। प्रतियोगिता मे भागलेने के लिए प्रतियोगी समूह भी जुटचुके थे। ठीक उसी समय ही एक मंगल तुरी की आबाज सुनाई दीआ इसी के साथ राजकुमारी चंद्रप्रभा हात मे बरमाला लेके सखियों के साथ कौसल साला मे पधार रहेथे। अति सुंदर गज गमनी चाल ,आके पिताजी की बगल मे स्थित आसन मे बैठगये। तुरंत ही मंत्री को राजा आदेश देनेलगे की कौसल सीघ्र ही प्रारंभ किआजाये। राजा की आदेश की अनुसार मंत्री साहब तुरंत कौसल की नीति नियमों के बारे मे सभा सज्जनों को सुनानेलगे। इसी मे प्रतियोगिओं केलिए नियम ऐसा था की जो भी प्रतियोगी अपना बल से नहीं बुद्धि की बल से अपनी आप को सेर की मुहं से अपनिआप को बचाने मे समर्थ होंगे उसे ही राजकुमारी चंद्रप्रभा बरमाला पहनाएंगे। बाद मे एक सेर को कौसल साला मे लायागेया जो एक पिंजरे मे कैद था।
इतिने सारे लोगों को देख के सेर घोर गर्जन करनेलगा। काफी भयंकर लग रहाथा। प्रश्न सुनते ही काफिसारे प्रतियोगी अपना नाम वापस लेगए। केबल अबसिस्ट रहगये तीन। उन तिनों को लेके कौसल कार्य प्रारमह कियागेया। कौसल साला की मध्यभाग मे एक तारजाली की अंदर सेर को पिंजरेसे मुक्त कियागेया और एक के बाद एक को अपना कौसल दिखाने के लिए सेर की मुहं मे भेजागेया। जब पहला वाला गेया तो उसे सेर तुरंत ही मारडाला। दूसरी वाला भय से बुद्धि की कोई प्रयोग किया ही नहीं केबल अपनि आप को सेर की मुहं से बचाने की प्रयास किया और बाल बाल बचगेया। अब बारी था तृतीय तथा अंतिम प्रतियोगी की जिसपर सभी के नजर था। व एक साधारण सा युबक,थोडासा अनपढ़ मगर प्रखर बुद्धिबान। व बैठ के सारे बातें अनुध्यान कर रहाथा जैसे ही कौसल साला मे प्रबेसकिया सेर उसको झपटनेकेलिए प्रयास किया। वह युबक भी सेर जैसा बोबाल करके निर्बिक बनके सेर की ऊपर कूदने लगा। सेर अब उसे भय कसरने लगा। पीछे हटनेलगा तो युबक कुछ रेत उठा के सेर की आंख मे फेंकदिया। सेर अंध जैसा बन गेया तो युबक सेर की कान पकड़ के घेश्ते घेश्ते लेके पिंजरे मे फिर से कैद करदिया। युबक का बहादूरी तथा बुद्धि कौसल को सभी ने सरहनाने लगे और चंद्रप्रभा गले मे बरमाला पहनादीया।
धन्यवाद.....
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