अति लोभ से मृत्यु
बासुदेबपुर मे एक ब्राम्हण रहते थे। नाम था संकर स्वामी। एकदम नैष्टिक। धर्म कर्म मे हमेसा रुचि रखते थे। हर रोज ब्रम्ह मुहूर्त से ही स्नान सौच करके भगबान का पूजापाठ करते थे। पाठ सास्त्र मे भी थोडासा पारंगम थे तो गाँब की लोग पंडित बोल के कहते और सम्मान करते थे। पत्नी तुलसी और बेटा राहुल के साथ उसका एक सुखी संसार चलता था। राहुल अब बिस साल का एक हट्टा कट्टा नौजबान। पढ़ाई मे कोई रुचि नहीं रखता। कभी कबार पिताजी को काम मे सहयोग करता।
गांब की समीप एक पहाड़ की नीचे संकर स्वामी का दोबिधा जमीन,जहां व अपना नित्यकर्म के बाद जाके खेती किसानी करते थे सुबह से साम तक। पत्नी और बेटा खानापीना पहंचादेतेथे। ब्राम्हण स्वामीजी मध्याह्न की समय मे कच्छ ही देर केलिए थोडासा जमीन पे स्थित एक पेड़ की नीचे सोजाते थे।
एक दिन की बात, जब व सोनेवाले ही थे वेसे ही वक्त व देखा की समीप की बाल्मीक से एक अहिराज फेन निकाल के फूफू कररहा है। संकर स्वामी कोचनेलगे सायद ये ईसी ही जमीन का ही देबता है। नागराज को बोलनेलगे हे,देबा,मुझे माफ़ करदो। मेरे से एक बड़ा दोष हुआ है। में कभी पहले से आप को कोई प्रसाद नहीं चढ़ाया। इतना ही बोल के घर की ओर प्रस्थान करनेलगे।
कुछ ही देर बात तुरंत एक कटोरा दूध लेके आये और साँप को समर्पण करके अपना काम पे चलेगये। साम हुई तो घर लौट रहेथे उशीहि रास्ते पे जहां व अहिराज को प्रसाद समर्पण कियेथे, मगर लो,एक आचंबित की बात ही था। कटोरा खाली था लेकिन अंदर एक स्वर्ण मुद्रा था। संकर स्वामी इसे भगबान की लीला और दया ऐसा समझनेलगे। फिर कटोरा और स्वर्ण मुद्रा लेके घर चलेआये। पत्नी तुलसी को सारे बात बताडाला। फिर तागित भी किये जैसे व इसी बात को किसी को भी ना बताये।
दूसरी दिन फिर अहिराज को दूध चढ़ाये। फिर से वही बात हुआ। उसको उसदिन भी एक और स्वर्ण मुद्रा मिला। तिसिरा दिन भी ऐसा ही हुआ। ऐसे ऐसे करके संकर स्वामी ढेर सारे स्वर्ण मुद्रा अमल करचुकेथे।
अचानक एकदिन किसी काम मे ब्राम्हण को सेहर जानापडा। बेटा राहुल को पास बुला के बोले,"बेटा एक काम करना,मेरे सेहर से लौटनेतक तू रोज एक कटोरा दूध लेके खेत की बालमक के समीप रखदेना। अन्यथा खेत देबता क्रोधीत हो जाएंगे।"राहुल पिताजी को हाँ बोला और दूधका कटोरा लेके खेत की ओर चलनेलगा। संकर स्वामी भी सहर की तरफ चलनेलगे।
राहुल दूधकी कटोरा लेके पिताजी की कहने के अनुरूप ही किया और घर चलाआया। दूसरा दिन जब गेया तो स्वर्ण मुद्रा देखके आचंबित होगेया। मन हि मन सोचनेलगा सायद इस बालमीक की अंदर ढेर सारे स्वर्ण मुद्रा है तो सांप को मारके कियूं उसे अपना बनाया ना जाये। वेसा ही करने को स्थिर किया और अगली दिन दूध की कटोरा लेके गेया। सांप की छेद पर रखके एक डंडा तैयार रखके छिपारहा। कुछ ही देर बात साँप निकल के दूध पिनेही वालिथि,ठीक उसी ही वक्त राहुल साँप को मारने को जारहाथा। साँप पहलेसे ही राहुल को चोट मारा तो उसका वहीं की वहीं ही मौत होगेया। संकर स्वामी सेहर से आके केबल रोनेलगे।
यही से ये सिख मिलती है की अति लोभ मौत का कारण बनता ही है। इसिलए हमे लोभ की बसबर्ती नहीं होना चाहिए।
धन्यवाद.....
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